महाराष्ट्र के लातूर जिले में स्थित उदगीर किला (उदयगिरि किला) मराठवाड़ा क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण भुईकोट (भूमि किला) है। यह किला न केवल अपनी मजबूत वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिकता का भी जीवंत साक्षी है। प्राचीन नाम “उदयगिरि” या “उदकगिरी” से जाना जाने वाला यह स्थान आज पर्यटकों, इतिहास प्रेमियों और श्रद्धालुओं को समान रूप से आकर्षित करता है।
नामकरण और प्राचीन इतिहास
उदगीर किले का नाम हिंदू संत उदयगिरि ऋषि (या उदागिर बाबा) के नाम पर पड़ा है। किले के अंदर उनकी समाधि भूमि स्तर से लगभग 60 फीट नीचे स्थित है। पौराणिक कथाओं और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, ऋषि उदयगिरि ने यहां तपस्या की थी और शिव लिंग की स्थापना की थी।
इस क्षेत्र का उल्लेख यादव काल के शिलालेखों में मिलता है। 1178 ई. के आसपास यादव राजा सिंघनदेव के शासनकाल में यहां के शासक का उल्लेख है। वास्तुशास्त्रीय साक्ष्यों के आधार पर किला मूल रूप से 11वीं-12वीं शताब्दी में चालुक्य काल में बनाया गया माना जाता है। बाद में बहमनी, बरीदशाही, मुगल, मराठा और निजाम शासकों ने इसे नियंत्रित किया और विस्तार दिया।
ऐतिहासिक महत्व – उदगीर का युद्ध
उदगीर किला 3 फरवरी 1760 के ऐतिहासिक युद्ध के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। सदाशिवराव भाऊ के नेतृत्व में मराठा सेना ने निजाम की सेना को निर्णायक रूप से पराजित किया। इस विजय के बाद “उदगीर की संधि” हुई, जिससे मराठों का प्रभाव बढ़ा। किला मराठों के लिए निजाम पर दबाव बनाए रखने का सैन्य अड्डा रहा। 1818 तक यह मराठा नियंत्रण में था, इसके बाद ब्रिटिशों के माध्यम से निजाम के पास चला गया। 1948 में हैदराबाद राज्य के भारत में विलय तक यह निजाम के अधीन रहा।
वास्तुकला और संरचना
उदगीर एक भुईकोट किला है, जो तीन तरफ गहरी घाटियों और एक तरफ शहर से घिरा है। इसकी मुख्य विशेषताएं हैं:
लगभग 40 फीट गहरी खाई (खंदक), जो सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा थी।
दोहरी दीवारें और लगभग 19 बुरुज (बुर्ज)।
बाहरी और आंतरिक किलेबंदी।
कई महल, दीवान-ए-खास, दीवान-ए-आम, बेगम महल, हवा महल और कबूतरखाना (संदेश भेजने के लिए कबूतर रखने का स्थान)।
अरबी और फारसी भाषा के दुर्लभ शिलालेख, जो स्थानीय मुस्लिम शासकों द्वारा ज्ञान और संस्कृति के प्रोत्साहन को दर्शाते हैं।
तोपों के टॉवर; 2022 में सफाई के दौरान 14वीं-15वीं शताब्दी की पांच तोपें और कई तोप के गोले मिले थे।
किले से भालकी और बीदर किलों तक जाने वाली गहरी भूमिगत सुरंग की मान्यता भी प्रचलित है।
आसपास की पहाड़ियों पर सफेद मिट्टी से बने पुराने सैन्य अवलोकन बिंदु और विश्राम गृह भी मौजूद हैं, हालांकि वे अब खंडहर अवस्था में हैं।
कैसे पहुंचें
सड़क मार्ग**: लातूर से लगभग 65-68 किमी दूर। महाराष्ट्र राज्य परिवहन की नियमित बसें उपलब्ध हैं।
रेल मार्ग**: उदगीर रेलवे स्टेशन से किला मात्र 1.5 किमी दूर है। रिक्शा आसानी से मिल जाते हैं।
हवाई मार्ग**: निकटतम हवाई अड्डे – औरंगाबाद (लगभग 264 किमी), हैदराबाद (लगभग 298 किमी) और पुणे (लगभग 370 किमी)।
पर्यटन के लिए सुझाव
किला राज्य संरक्षित स्मारक है। घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च है। यहां जाते समय आरामदायक जूते पहनें क्योंकि परिसर बड़ा है। समाधि स्थल पर श्रद्धाभाव बनाए रखें। स्थानीय गाइड से इतिहास की रोचक बातें जान सकते हैं।
उदगीर किला केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की वीरता, संस्कृति और धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक है। रंगारंग इंडिया के पाठकों से अपील है कि जब भी मराठवाड़ा की यात्रा हो, तो इस ऐतिहासिक धरोहर को जरूर देखें। इतिहास की इन दीवारों में छिपी कहानियां आपको अतीत से जोड़ेंगी और प्रेरणा देंगी।
रंगारंग इंडिया पर महाराष्ट्र की ऐसी ही अनमोल विरासतों की और खोज जारी रहेगी। आप भी अपनी यात्रा के अनुभव साझा करें!



















































